समुदाय आधारित बाल सुरक्षा: एक नई सामाजिक चेतना
भारत में लापता बच्चों की बढ़ती घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक असमानता, आर्थिक असुरक्षा और सामुदायिक विघटन का भी गंभीर संकेत हैं। ऐसे समय में उत्तर-पश्चिम दिल्ली के जहांगीरपुरी, शाहबाद डेयरी और आज़ादपुर मंडी जैसे क्षेत्रों से उभरता सामुदायिक मॉडल उम्मीद की एक मजबूत किरण बनकर सामने आया है। कुछ वर्ष पहले तक इन पुनर्वास कॉलोनियों में बच्चों का अचानक लापता हो जाना लगभग सामान्य बात मान लिया गया था। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों के पास न समय था, न संसाधन और न ही ऐसी कोई व्यवस्था, जो संकट की घड़ी में उनका साथ दे सके। गरीबी, पलायन, भीड़भाड़, घरेलू हिंसा, बाल श्रम और मानव तस्करी जैसे अनेक कारण बच्चों को असुरक्षा की ओर धकेल रहे थे। लेकिन आज स्थिति बदल रही है। अब समुदाय स्वयं बच्चों की सुरक्षा की पहली दीवार बन गया है। स्थानीय बाल समूह, महिला संगठन, स्कूल और स्वयंसेवक मिलकर एक ऐसा अनौपचारिक निगरानी तंत्र तैयार कर चुके हैं, जिसमें यदि कोई बच्चा कई दिनों तक स्कूल नहीं आता, तो तुरंत उसके घर जाकर जानकारी ली जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित संस्थाओं को स...